सन्दर्भ
- पिछले एक दशक में भारत ने महिलाओं के प्रति कल्याण-उन्मुख दृष्टिकोण से आगे बढ़कर महिला-नेतृत्व वाले विकास के प्रतिमान की ओर महत्वपूर्ण परिवर्तन देखा है।
महिला-नेतृत्व वाला विकास क्या है?
- महिला-नेतृत्व वाला विकास कल्याण और सशक्तीकरण से आगे बढ़कर महिलाओं को आर्थिक वृद्धि, शासन, नवाचार तथा निर्णय-निर्माण के केन्द्र में स्थापित करता है।
- यह महिलाओं को केवल योजनाओं की लाभार्थी नहीं, बल्कि सामाजिक एवं आर्थिक परिवर्तन की प्रेरक शक्ति के रूप में देखता है।
महिला-नेतृत्व वाले विकास के प्रमुख स्तंभ
1.स्वास्थ्य, पोषण एवं मातृ देखभाल
- प्रधानमंत्री मातृ वंदना योजना, प्रधानमंत्री सुरक्षित मातृत्व अभियान, जननी सुरक्षा योजना तथा जननी शिशु सुरक्षा कार्यक्रम जैसी योजनाओं ने मातृ एवं शिशु स्वास्थ्य सेवाओं को सुदृढ़ किया है।
प्रमुख उपलब्धियाँ:
- मातृ मृत्यु अनुपात 130 प्रति लाख जीवित जन्म (2014-15) से घटकर 88 (2021-23) हो गया।
- संस्थागत प्रसव 79% (2015-16) से बढ़कर 90.6% (2023-24) हो गया।
- मिशन इंद्रधनुष तथा पोषण 2.0 ने टीकाकरण और पोषण सहायता का विस्तार किया है।
2. शिक्षा एवं कौशल विकास
- बेटी बचाओ, बेटी पढ़ाओ ने बालिका के अस्तित्व एवं शिक्षा के प्रति जागरूकता बढ़ाई है।
- समग्र शिक्षा तथा कस्तूरबा गांधी बालिका विद्यालयों ने बालिकाओं के नामांकन एवं विद्यालय में बने रहने की दर में सुधार किया है।
- प्रधानमंत्री कौशल विकास योजना तथा नव्या (युवा किशोरी बालिकाओं के लिए व्यावसायिक प्रशिक्षण के माध्यम से आकांक्षाओं का पोषण) जैसी योजनाएँ बालिकाओं में भविष्योपयोगी कौशलों को बढ़ावा दे रही हैं।

3. वित्तीय समावेशन एवं उद्यमिता
- प्रधानमंत्री जन धन योजना ने लाखों महिलाओं को औपचारिक बैंकिंग व्यवस्था से जोड़ा है।
- सुकन्या समृद्धि योजना ने बालिकाओं के लिए दीर्घकालिक वित्तीय नियोजन को प्रोत्साहित किया है।
- प्रधानमंत्री मुद्रा योजना के लाभार्थियों में महिलाओं की बड़ी हिस्सेदारी है।

4. डिजिटल एवं आर्थिक सशक्तीकरण
- महिलाएँ डिजिटल सेवाओं, ई-वाणिज्य तथा प्रौद्योगिकी-आधारित आजीविकाओं में बढ़-चढ़कर भागीदारी कर रही हैं।
- सरकारी ई-बाज़ार मंच पर वुमनिया तथा शी-मार्ट पहल महिला उद्यमियों के लिए बाज़ार तक पहुँच का विस्तार कर रही हैं।
- नमो ड्रोन दीदी महिलाओं को कृषि क्षेत्र में प्रौद्योगिकी-आधारित सेवा प्रदाता बनने में सक्षम बना रही है।

5. सुरक्षा एवं जीवन की गुणवत्ता
- प्रधानमंत्री उज्ज्वला योजना ने रसोई गैस की उपलब्धता के माध्यम से घरों के भीतर होने वाले वायु प्रदूषण को कम किया है।
- जल जीवन मिशन ने पानी लाने के बोझ को कम किया है तथा स्वास्थ्य परिणामों में सुधार किया है।
- प्रधानमंत्री आवास योजना ने महिलाओं के स्वामित्व एवं आवासीय सुरक्षा को सुदृढ़ किया है।
6. नेतृत्व एवं राजनीतिक भागीदारी
- वर्ष 2024 के लोकसभा चुनावों में महिलाओं की हिस्सेदारी कुल मतदाताओं का 48.62% रही।
- पंचायती राज संस्थाओं में 14.5 लाख से अधिक महिलाएँ निर्वाचित प्रतिनिधि के रूप में कार्यरत हैं।
- नारी शक्ति वंदन अधिनियम, 2023 लोकसभा एवं राज्य विधानसभाओं में महिलाओं के लिए 33% आरक्षण प्रदान करता है।
महिला-नेतृत्व वाले विकास का महत्व
- यह उत्पादक कार्यबल का विस्तार करके तथा आर्थिक भागीदारी को सुदृढ़ बनाकर समावेशी एवं सतत आर्थिक वृद्धि को बढ़ावा देता है।
- श्रम बाज़ार एवं उद्यमिता में महिलाओं की अधिक भागीदारी नवाचार, रोजगार सृजन तथा आर्थिक विविधीकरण में योगदान देती है।
- शासन एवं निर्णय-निर्माण में महिलाओं का बढ़ा हुआ प्रतिनिधित्व लोकतांत्रिक भागीदारी को मजबूत करता है तथा अधिक समावेशी नीतिनिर्माण को प्रोत्साहित करता है।
- यह लैंगिक समानता, निर्धनता उन्मूलन, गुणवत्तापूर्ण शिक्षा, उत्तम स्वास्थ्य एवं समावेशी विकास सहित अनेक सतत विकास लक्ष्यों की प्राप्ति में प्रत्यक्ष योगदान देता है।
महिला-नेतृत्व वाले विकास को साकार करने की चुनौतियाँ
1.महिला श्रमबल भागीदारी का निम्न स्तर
- सुधारों के बावजूद संरचनात्मक एवं सामाजिक बाधाओं के कारण महिलाओं की कार्यबल में भागीदारी अपनी संभावित क्षमता से कम बनी हुई है।
2. लैंगिक वेतन अंतर की निरंतरता
- महिलाओं को अभी भी वेतन असमानता तथा उच्च वेतन वाले रोजगार अवसरों तक असमान पहुँच का सामना करना पड़ता है।
3. डिजिटल लैंगिक विभाजन
- डिजिटल प्रौद्योगिकी, अंतरजाल संपर्क एवं डिजिटल कौशलों तक असमान पहुँच विशेषकर ग्रामीण क्षेत्रों की महिलाओं को प्रभावित करती है।
4. अवैतनिक देखभाल कार्य का बोझ
- घरेलू कार्यों एवं देखभाल संबंधी जिम्मेदारियों का असमान बोझ महिलाओं पर अधिक पड़ता है, जिससे उनकी सवेतन रोजगार में भागीदारी कम होती है।
5. सामाजिक एवं सांस्कृतिक बाधाएँ
- गहराई से जड़ जमाए पितृसत्तात्मक मानदंड, लैंगिक रूढ़ियाँ तथा सुरक्षा संबंधी चिंताएँ महिलाओं की गतिशीलता और अवसरों को सीमित करती हैं।
6. नेतृत्व पदों में अपर्याप्त प्रतिनिधित्व
- हालिया प्रगति के बावजूद महिलाएँ उच्च कॉरपोरेट, राजनीतिक, प्रशासनिक तथा संस्थागत नेतृत्व पदों पर अभी भी कम प्रतिनिधित्व रखती हैं।
आगे की राह
- भारत को विनिर्माण, सेवा क्षेत्र, हरित अर्थव्यवस्था तथा उभरती प्रौद्योगिकियों में महिलाओं के लिए अधिक रोजगार अवसर सृजित करने होंगे।
- शिशु देखभाल केन्द्रों, शिशुगृहों तथा सामाजिक सुरक्षा व्यवस्थाओं का विस्तार अवैतनिक देखभाल कार्य के बोझ को कम कर सकता है।
- महिला आरक्षण तथा नेतृत्व विकास कार्यक्रमों का प्रभावी क्रियान्वयन शासन में महिलाओं की भागीदारी को और गहरा बना सकता है।
निष्कर्ष
- महिलाओं-केंद्रित कल्याण से महिला-नेतृत्व वाले विकास की ओर भारत का परिवर्तन एक ऐसे विकास दृष्टिकोण को दर्शाता है, जिसमें महिलाओं को आर्थिक एवं सामाजिक प्रगति के केन्द्र में रखा गया है।
- विकसित भारत 2047 की दिशा में आगे बढ़ते हुए समावेशी एवं सतत विकास की प्राप्ति के लिए महिलाओं की भागीदारी, नेतृत्व और सशक्तीकरण को और अधिक मजबूत बनाना अत्यंत आवश्यक होगा।
स्रोत: PIB
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संक्षिप्त समाचार 02-06-2026